Desh Bhakti ke Geet Vedio

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यह राष्ट्र जो कभी विश्वगुरु था, आजभी इसमें वह गुण,योग्यता व क्षमता विद्यमान है। किन्तु प्रकृति के संसाधनों व उत्कृष्ट मानवीयशक्ति से युक्त इस राष्ट्रको काल का ग्रहण लग चुका है। जिस दिन यह ग्रहणमुक्त हो जायेगा, पुनः विश्वगुरु होगा। राष्ट्रोत्थानका यह मन्त्र पूर्ण हो। आइये, युगकी इस चुनोतीको भारतमाँ की संतान के नाते स्वीकार कर हम सभी इसमें अपना योगदान दें। निस्संकोच ब्लॉग पर टिप्पणी/अनुसरण/निशुल्क सदस्यता व yugdarpan पर इमेल/चैट करें,संपर्कसूत्र- तिलक संपादक युगदर्पण 09911111611, 9999777358.

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स्वपरिचय: जन्म से ही परिजनों से सीखा 'अथक संघर्ष' तीसरी पीडी भी उसी राह पर!

स्व आंकलन:

: : : सभी कानूनी विवादों के लिये क्षेत्राधिकार Delhi होगा। स्व आंकलन: हमारे पिटारे के अस्त्र -शस्त्र हमारे जो 5 समुदाय हैं, वे अपना परिचय स्वयं हैं (1) शर्मनिरपेक्षता का उपचार (2) देश का चौकीदार कहे- देश भक्तो, जागते रहो-संपादक युगदर्पण, (3) लेखक पत्रकार राष्ट्रीय मंच, (राष्ट्र व्यापी, राष्ट्र समर्पित)- संपादक युगदर्पण, (4) युग दर्पण मित्र मंडल, (5) Muslim Rashtriya Ekatmta Manch (MREM) आप किसी भी विषय पर लिखते, रूचि रखते हों, युग दर्पण का हर विषय पर विशेष ब्लाग है राष्ट्र दर्पण, समाज दर्पण, शिक्षा दर्पण, विश्व दर्पण, अंतरिक्ष दर्पण, युवा दर्पण,... महिला घर परिवार, पर्यावरण, पर्यटन धरोहर, ज्ञान विज्ञानं, धर्म संस्कृति, जीवन शैली, कार्य क्षेत्र, प्रतिभा प्रबंधन, साहित्य, अभिरुचि, स्वस्थ मनोरंजन, समाचार हो या परिचर्चा, समूह में सभी समाविष्ट हैं ! इतना ही नहीं आर्कुट व ट्विटर के अतिरिक्त, हमारे 4 चेनल भी हैं उनमें भी सभी विषय समाविष्ट हैं ! सभी विषयों पर सारगर्भित, सोम्य, सुघड़ व सुस्पष्ट जानकारी सुरुचिपूर्ण ढंगसे सुलभ करते हुए, समाज की चेतना, उर्जा, शक्तिओं व क्षमताओं का विकास करते हुए, राष्ट्र भक्ति व राष्ट्र शक्ति का निर्माण तभी होगा, जब भांड मीडिया का सार्थक विकल्प "युग दर्पण समूह" सशक्त होगा ! उपरोक्त को मानने वाला राष्ट्रभक्त ही इस मंच से जुड़ सकता है.: :

बिकाऊ मीडिया -व हमारा भविष्य

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शनिवार, 22 जनवरी 2011

26 जनवरी गणतंत्र दिवस की एकता यात्रा व विरोध के स्वरों का निहितार्थ

26 जनवरी गणतंत्र दिवस की एकता यात्रा व विरोध के स्वरों का निहितार्थ
जबसे राज्य में उमर अब्दुल्ला मु.मं.बने हैं हम सोचते थे कि cong - PDP गठबंधन के समय बने आतंक समर्थक नेताओं के बाद अब वातावरण सुधरेगा. किन्तु यह तो PDP से बड़ा पाकि. निकला ! जब देश का तिरंगा जलाया जाता है तो इनकी सरकार आंख बंद रखती है ! जब अमरनाथ यात्रिओं को दी सुविधा की घोषणा रोक ली जाती है, जहाँ पाक समर्थक टोले को संतुष्ट करना सरकारी आवश्यकता हो! वहां मनोबल आतंकियों का बढ़ाया जाता है, सेना को अपराधी ठहराया जाता है! आवश्यक हो जाता है सेना व जानता का मनोबल बढ़ाया जाये और यह दायित्व बनता है सरकार का!  केंद्र व राज्य सरकार अपना दायित्व न निभाए तो राष्ट्रवादी सोच के दल ने यह बीड़ा उठाया ! राष्ट्रवाद के मानबिंदु राष्ट्र ध्वज को राष्ट्रीय उत्सव पर फहराना सेना व जानता के मनोबल का प्रतीक बनता है, राजनीति का नहीं ! इसका विरोध करना, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उनका साथ देना राष्ट्र के शत्रुओं का कार्य है ! राजनैतिक रोटी सेकना इसे कहते हैं ! 
सारा चित्र और स्पष्ट करने हेतु दृश्य पटल का विस्तार करते है: 
कुछ पीछे चलते हैं जब प्रधानमंत्री जी ने कश्मीर मुद्दे पर बुलाई सर्वदलीय बैठक में एक बड़ी गम्भीर और व्यापक बहस छेड़ने वाली बात कह दी कि "यदि सभी दल चाहें तो कश्मीर को स्वायत्तता दी जा सकती है…", किन्तु आश्चर्य की बात है कि भाजपा को छोड़कर किसी भी दल ने इस बात पर आपत्ति दर्ज करना तो दूर स्पष्टीकरण माँगना भी उचित नहीं समझा।हमारे एक मित्र सुरेश चिपलूनकर जी के अनुसार प्रधानमंत्री द्वारा प्रस्तावित "स्वायत्तता" का क्या अर्थ है? क्या प्रधानमंत्री या कांग्रेस स्वयं भी इस बारे में स्पष्ट है? या ऐसे ही हवा में कुछ वक्तव्य  उछाल दिया? कांग्रेस वाले स्वायत्तता किसे देंगे? उन लोगों को जो वर्षों से भारतीय टुकड़ों पर पल रहे हैं फ़िर भी अमरनाथ में यात्रियों की सुविधा के लिये अस्थाई रुप से भूमि का एक टुकड़ा देने में उन्हें कष्ट होने लगता है और विरोध में सड़कों पर आ जाते हैं… या स्वायत्तता उन्हें देंगे जो इस भूमि पर सरेआम भारत का तिरंगा जला रहे हैं, 15 अगस्त को "काला दिवस" मना रहे हैं?
इतने गम्भीर मुद्दे पर राष्ट्रीय मीडिया, समाचारपत्रों और चैनलों की ठण्डी प्रतिक्रिया और शून्य प्रस्तुति और भी आश्चर्य पैदा करने वाली थी। प्रधानमंत्री के इस वक्तव्य के बाद भी, मीडिया क्या दिखा रहा था ? 1) शाहरुख खान ने KKR के लिये पाकिस्तानी खिलाड़ी को खरीदा और पाकिस्तान के खिलाड़ियों का समर्थन किया… 2) राहुल गाँधी की लोकप्रियता में भारी उछाल…, 3) पीपली लाइव की लॉंचिंग… आदि-आदि-आदि। कश्मीर की हिंसा के बारे क्या दिखाया गया ?… मात्र शीर्षक, उपशीर्षक, संकेतक और स्क्रीन में नीचे चलने वाले स्क्रोल में अधिकतर आपको "कश्मीर में गुस्सा…", "कश्मीर का युवा आक्रोशित…", "कश्मीर में सुरक्षा बलों पर आक्रोशित युवाओं की पत्थरबाजी…" जैसी खबरें दिखाई गई। प्रश्न उठता है कि क्या मीडिया और चैनलों में राष्ट्रबोध नाम की चीज़ एकदम समाप्त हो गई है? या ये किसी के संकेत पर इस प्रकार के शीर्षक दिखाते हैं?
भारत की सरकार के कई कानून वहाँ लागू नहीं, कुछ को वे मानते नहीं, उनका झण्डा अलग है, उनका संविधान अलग है! भारत सरकार (यानी प्रकारान्तर से करोड़ों टैक्स भरने वाले) तो इन कश्मीरियों को 60 साल से पाल-पोस रहे हैं,धारा 370 के तहत उन्हें प्राप्त विशेषाधिकार के कारण भारत का नागरिक वहाँ भूमि खरीद नहीं सकता, हिन्दुओं(कश्मीरी पण्डितों) को सुनियोजित" धार्मिक छटनी" के तहत कश्मीर से बाहर खदेड़ा जा चुका है… फ़िर इन्हें किस बात का आक्रोश?
कहीं यह हरामखोरी की चर्बी तो नहीं? लगता तो यही है। अन्यथा क्या कारण है कि 14-15 साल के लड़के से लेकर यासीन मलिकगिलानी और अब्दुल गनी लोन जैसे बुज़ुर्ग भी भारत सरकार से, जब देखो तब खफ़ा रहते हैं। पूरे देश का खून निचोढ़ कर खटमल पाले जा रहे हैं और खटमल ही आक्रोश दिखाए ? आश्चर्य !
जबकि दूसरी तरफ़ देखें तो भारत के नागरिक, हिन्दू संगठन, सभी कर दाता और भारत को अखण्ड देखने की चाह रखने वाले देशप्रेमी… जिनको वास्तव में गुस्सा आना चाहिये, आक्रोशित होना चाहिये, रोष जताना चाहिये… वे नपुंसक की भांति  चुपचाप बैठे और "स्वायत्तता" का राग सुन रहे थे? कोई भी उठकर ये प्रश्न नहीं करता कि कश्मीर के पत्थरबाजों को पालने, यासीन मलिक जैसे देशद्रोहियों को दिल्ली लाकर पाँच सितारा होटलों में रुकवाने और भाषण करवाने के लिये हम टैक्स क्यों दें? किसी राजदीप या बुरका दत्त ने कभी किसी कश्मीरी पण्डित का इंटरव्यू लिया कि उसमें कितना आक्रोश है? 
लाखों हिन्दू लूटे गये, बलात्कार किये गये, उनके मन्दिर तोड़े गये, क्योंकि गिलानी के पाकिस्तानी आका ऐसा चाहते थे, तो जिन्हें गुस्सा आया होगा कभी उन्हें किसी चैनल पर दिखाया? नहीं दिखाया, क्यों? क्या आक्रोशित होने और गुस्सा होने का अधिकार केवल कश्मीर के हुल्लड़बाजों को ही है, राष्ट्रवादियों को नहीं?
किन्तु जैसे ही "राष्ट्रवाद" की बात की जाती है, मीडिया को हुड़हुड़ी का बुखार आ जाता है, राष्ट्रवाद की बात करना, हिन्दू हितों की बात करना तो मानो वर्जित ही है… किसी टीवी एंकर की औकात नहीं है कि वह कश्मीरी पण्डितों की दुर्गति और नारकीय परिस्थितियों पर कोई कार्यक्रम बनाये और उसे शीर्षक बनाकर जोर-शोर से प्रचारित कर सके, कोई चैनल देश को यह नहीं बताता कि आज तक कश्मीर के लिये भारत सरकार ने कितना-कुछ किया है, क्योंकि उनके मालिकों को "राजनीति के अनुसार" रहना है, उन्हें कांग्रेस को रुष्ट नहीं करना है… स्वाभाविक सी बात है कि तब जनता पूछेगी कि इतना पैसा खर्च करने के बाद भी कश्मीर में बेरोज़गारी क्यों है? विगत 60 वर्ष से कश्मीर में किसकी सरकार चल रही थी? दिल्ली में बैठे सूरमा, खरबों रुपये खर्च करने बाद भी कश्मीर में शान्ति क्यों नहीं ला सके? ऐसे असुविधाजनक प्रश्नों से "शर्म-निरपेक्ष" भी बचना चाहता है, इसलिये हमें समझाया जाता रहा है कि "कश्मीरी युवाओं में आक्रोश और गुस्सा" है।
इधर अपने देश में गद्दार श्रेणी का मीडिया है, प्रस्तुत चित्र में देखिये "नवभारत टाइम्स अखबार" चित्र के शीर्षक में लिखता है "कश्मीरी मुसलमान महिला" और "भारतीय पुलिसवाला", क्या अर्थ है इसका? क्या नवभारत टाइम्स संकेत करना चाहता है कि कश्मीर भारत से अलग हो चुका है और भारतीय पुलिस(?) कश्मीरी मुस्लिमों पर अत्याचार कर रही है? यही तो पाकिस्तानी और अलगाववादी कश्मीरी भी कहते हैं… हास्यास्पद लगता है जब यही मीडिया संस्थान "अमन की आशा" टाइप के आलतू-फ़ालतू कार्यक्रम भी आयोजित करते हैं। 
जबकि उधर पाकिस्तान में उच्च स्तर पर सभी के सभी लोग कश्मीर को भारत से अलग करने में जी-जान से जुटे हैं, इसका प्रमाण यह है कि हाल ही में जब संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान किं मून ने कश्मीर के सन्दर्भ में अपना विवादास्पद बयान पढ़ा था (बाद में उन्होंने कहा कि यह उनका मूल बयान नहीं है)... वास्तव में बान के बयान का आलेख बदलने वाला व्यक्ति संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान का प्रवक्ता फ़रहान हक है, जिसने मूल बयान में हेराफ़ेरी करके उसमें "कश्मीर" जोड़ दिया। फ़रहान हक ने तो अपने देश के प्रति देशभक्ति दिखाई, किन्तु भारत के तथाकथित सेकुलरिज़्म के पैरोकार क्यों अपना मुँह सिले बैठे रहते हैं? 
विश्व भर में दाऊद इब्राहीम का पता लेकर घूमते रहते हैं… दाऊद यहाँ है, दाऊद वहाँ है, दाऊद ने आज खाना खाया, दाऊद ने आज पानी पिया… अरे भाई, देश की जनता को इससे क्या मतलब? देश की जनता तो तब खुश होगी, जब सरकार "रॉ" जैसी संस्था के आदमियों के सहयोग से दाऊद को पाकिस्तान में घुसकर निपटा दें… और फ़िर मीडिया भारत की सरकार का अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर गुणगान करे… यह तो मीडिया और सरकार से बनेगा नहीं… इसलिये "अमन की आशा" का राग अलापते हैं…।
दिल्ली और विभिन्न राज्यों में एक "अल्पसंख्यक आयोग" और "मानवाधिकार आयोग" नाम के दो "बिजूके" बैठे हैं, किन्तु  इनकी दृष्टी में कश्मीरी हिन्दुओं का कोई मानवाधिकार नहीं है, गलियों से आकर पत्थर मारने वाले, गोलियाँ चलाने वालों से सहानुभूति है, किन्तु अपने घर-परिवार से दूर रहकर 24 घण्टे अपना दायित्व निभाने वाले सैनिक के लिये कोई मानवाधिकार नहीं? मार-मारकर भगाये गये कश्मीरी पण्डित इनकी दृष्टी में "अल्पसंख्यक" नहीं हैं, क्योंकि "अल्पसंख्यक" की परिभाषा भी तो इन्हीं कांग्रेसियों द्वारा गढ़ी गई है। 
जब मनमोहन सिंह जी को यह कहना तो याद रहता है कि "देश के संसाधनों पर पहला हक मुस्लिमों का है…", किन्तु कश्मीरी पंडितों के दर्द और लाखों अमरनाथ यात्रियों के औचित्यपूर्ण अधिकार के मुद्दे पर उनके मुँह में दही जम जाता है। तब सारा शासन प्रशासन, उनके सहारे चलते राज्य सभी उसका अनुसरण ही करेंगे ! वास्तव में गाँधीवादियों, सेकुलरों और मीडिया ने मिलकर एकदम "बधियाकरण" ही कर डाला है देश का… देशहित से जुड़े किसी मुद्दे पर कोई सार्थक बहस नहीं, भारत के हितों से जुड़े मुद्दों पर देश का पक्ष लेने की बजाय, या तो विदेशी ताकतों का गुणगान या फ़िर देशविरोधी ताकतों के प्रति सहानुभूति पैदा करना… आखिर कितना गिरेगा हमारा मीडिया? 
अब जबकि खरबों रुपये खर्च करने के बाद भी कश्मीर की स्थिति 20 वर्ष पूर्व जैसी ही है, तो समय आ गया है कि हमें गिलानी-यासीन जैसों से दो-टूक बात करनी चाहिये कि आखिर किस प्रकार की आज़ादी चाहते हैं वे? कैसी स्वायत्तता चाहिये उन्हें? क्या स्वायत्तता का अर्थ यही है कि भारत उन लोगों को अपने आर्थिक संसाधनों से पाले-पोसे, वहाँ बिजली परियोजनाएं लगाये, बाँध बनाये… यहाँ तक कि डल झील की सफ़ाई भी केन्द्र सरकार करवाये? उनसे पूछना चाहिये कि 60 वर्ष में भारत सरकार ने जो खरबों रुपया दिया, उसका क्या हुआ? उसके बदले में पत्थरबाजों और उनके आकाओं ने भारत को एक पैसा भी लौटाया? क्या वे केवल बेशर्मी का खाना ही जानते हैं, चुकाना नहीं?
गलती पूरी तरह से उनकी भी नहीं है, नेहरु ने अपनी गलतियों से जिस कश्मीर को हमारी छाती पर बोझ बना दिया था, उसे ढोने में सभी सरकारें लगी हुई हैं… जो वर्ग विशेष को खुश करने के चक्कर में कश्मीरियों की सेवा करती रहती हैं। ये जो बार-बार मीडियाई भाण्ड, कश्मीरियों का गुस्सा, युवाओं का आक्रोश जैसी बात कर रहे हैं, यह आक्रोश और गुस्सा मात्र  "पाकिस्तानी" भावना रखने वालों के दिल में ही है, अन्यों के दिल में नहीं, तो यह लोग मशीनगनों से गोलियों की बौछार खाने की औकात ही रखते हैं जो कि उन्हें दिखाई भी जानी चाहिये…, उलटे यहाँ तो सेना पूरी तरह से हटाने की बात हो रही है। अलगाववादियों से सहानुभूति रखने वाला देशभक्त हो ही नहीं सकता, उन्हें जो भी सहानुभूति मिलेगी वह विदेश से…। चीन ने जैसे थ्येन-आनमन चौक में विद्रोह को कुचलकर रख दिया था… अब तो वैसा ही करना पड़ेगा। 
कश्मीर को 5 वर्ष के लिये पूरी तरह सेना को सौंप दो, अलगाववादी नेताओं को बंद करके जेल में सड़ाओ या उड़ाओ, धारा 370 समाप्त करके जम्मू से हिन्दुओं को कश्मीर में बसाना शुरु करो और उधर का जनसंख्या सन्तुलन बदलो…विभिन्न प्रचार माध्यमों से मूर्ख कश्मीरी उग्रवादी नेताओं और "भटके हुए नौजवानों"(?) को समझाओ कि भारत के बिना उनकी औकात दो कौड़ी की भी नहीं है… क्योंकि यदि वे पाकिस्तान में जा मिले तो नर्क मिलेगा और उनके दुर्भाग्य से "आज़ाद कश्मीर"(?) बन भी गया तो अमेरिका वहाँ किसी न किसी बहाने कदम जमायेगा…, अन्तर्राष्ट्रीय बिरादरी की चिंता मत करो… पाकिस्तान जब भी कश्मीर राग अलापे, पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर का मुद्दा जोरशोर से उठाओ…ऐसे कई-कई कदम हैं, जो तभी उठ पायेंगे, जब मीडिया सरकार का साथ दे और "अमन की आशा" जैसी नॉस्टैल्जिक उलटबाँसियां न करे…। 
किन्तु अमेरिका क्या कहेगा, पाकिस्तान क्या सोचेगा, संयुक्त राष्ट्र क्या करेगा, चीन से सम्बन्ध खराब तो नहीं होंगे जैसी "मूर्खतापूर्ण और कायरतापूर्ण सोचों" के कारण ही हमने इस देश और कश्मीर का ये हाल कर रखा है… कांग्रेस आज कश्मीर को स्वायत्तता देगी, कल असम को, परसों पश्चिम बंगाल को, फ़िर मणिपुर और केरल को…? इज़राइल तो बहुत दूर है… हमारे पड़ोस में श्रीलंका जैसे छोटे से देश ने तमिल आंदोलन को कुचलकर दिखा दिया कि यदि नेताओं में "रीढ़ की हड्डी" में जान हो, जनता में देशभक्ति की भावना हो और मीडिया सकारात्मक रुप से देशहित में सोचे तो बहुत कुछ किया जा सकता है…
किन्तु यहाँ तो मु.मं.उमर एकता यात्रा को रोकने की धमकी देते हैं, किन्तु यात्रा विरोधी प्रदर्शन को नहीं ! जो शक्ति वो एकता यात्रा को रोकने में लगा रहे हैं काश उसका एक अंश भी तिरंगा जलाने वालों को रोकने में लगाया होता तो आतंकियों का मनोबल इतना न बढता और तिरंगा या एकता यात्रा विवाद का विषय नहीं बनता! हमारे विषद का विषय यही है !!   
विविध विषयों पर मेरे अन्य लेख, भारतीय वायु सेना के उप प्रमुख अवम(से.नि.)विश्व मोहन त्तिवारी व् अन्य मित्रों के लेख आप देख तथा उनपर टिपण्णी कर सकते हैं 
-- तिलक संपादक युग दर्पण  09911111611
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"यह राष्ट्र जो कभी विश्वगुरु था,आजभी इसमें वह गुण,योग्यता व क्षमता विद्यमान है! आओ मिलकर इसे बनायें !!"-- तिलक

सोमवार, 17 जनवरी 2011

स्वभाषा और देशप्रेम ----------------------------------------------------- विश्वमोहन तिवारी, एयर वाइस मार्शल,(से .नि .)

यह राष्ट्र जो कभी विश्वगुरु था,आजभी इसमें वह गुण,योग्यता व क्षमता विद्यमान है! आओ मिलकर इसे बनायें- तिलक

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स्वभाषा’ शब्द में हमारे राष्ट्र के सभी प्रदेशों की मातृभाषाएं सम्मिलित हैं।मातृभाषा तथा राष्ट्रप्रेम पर विचार करने के लिये बहुत सक्षेप में भाषा तथा राष्ट्र की अवधारणाओं पर विचार आवश्यक है।यह एक विचित्र सत्य है, इस सारे विश्व में अनोखा है, कि भारत राष्ट्र एक या दो अपवादों को छोड़कर हमेशा अनेक राजनैतिक देशों या प्रदेशों में बँटा रहा है, यद्यपि उनमें से महत्वाकांक्षी राजाओं का ध्येय समस्त भारत पर राज्य करना होता था।उदाहरणार्थ तमिल प्रदेश के एक राजा के नाम में ही यह स्पष्ट था कि वे हिमालय से लेकर दक्षिण– समुद्री तट तक के राजा है।

जब मै स्कूल में भारत के अनेकों देशों ­प्रदेशों के राज्यों के इतिहास पढ़ता था तब भी मेरे मन में यह विचार नहीं आया था कि भारत एक राष्ट्र नहीं रहा।1958 में वायुसेना के अंगे्रजी से प्रभावित मित्र बोले कि भारत, आज जैसे भौगोलिक रूप में एक राष्ट्र कभी नहीं था, और न होता, वह तो अंग्रेजी ने हमें भारत प्रदान किया है।उस समय में उनसे असहमत होते हुए उन्हे कुछ तर्क नही दे पाया।किन्तु थोड़ा सा सोचने पर याद आया कि आदि शंकराचार्य क्यों भारत की चारों दिशाओं में, आज से 1100–1200 वर्ष पूर्व की कठिन तथा खतरनाक परिस्थितियों में, गये और चार धाम या तीर्थ स्थान स्थापित किये, फिर वे कश्मीर भी गये, क्यों ? कहीं न कहीं, उन राज्यों की विभिन्न सीमाओं के बावजूद, उस महापुरूष ने आदिकाल से चली आ रही राष्ट्रीय एकता को देखा था और तत्कालीन विदेशी आक्रमणों के कारण, सम्भवतः उसने सोचा कि उस अदृश्य, भावनात्मक, सांस्कृतिक राष्ट्रीय एकता को कुछ भौतिक प्रतीक दे दिये जायेंऌ और अपने परिवार तथा प्राणों की चिन्ता न करता हुआ वह एक असंभव सा कार्य कर गया। भारतीयों की राष्ट्र की अवधारणा मूलतः भावनात्मक है, सांस्कृतिक है। यदि किसी राष्ट्र के नागरिकों में भावनात्मक और सांस्कृतिक एकता की भावना नहीं है तब वे राष्ट्र शक्ति बल पर बनाये जाने के बाद भी टूट जाते हैं, बंग्ला देश, यू .एस ..एस .आर आदि उदाहरण ताजे हैंऌ और यदि हो तब शक्ति द्वारा तोड़ेजाने के बाद भी एक हो जते हैं, यथा जर्मनी। कुछ लोग संभवतः कहना चाहे ं कि भारतीयों की राष्ट्र की अवधारणा आध्यात्मिक भी है, तब मेैै कहूंगा कि आध्यात्मिक दृष्टि से तो भारतीय ‘उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्’ है।

भाषा क्या है ? अधिकांश लोग समझते हैं कि भाषा तो समाज में विचारों के आदान प्रदान का माध्यम है।भाषा की यह परिभाषा तो वैसी हुई कि वृक्ष पीड़, पत्ते, फूल तथा फल का योग है – चूँकि जड़ दिखती नही है उसे भूल गये।भाषा न केवल विचारों को अभिव्यक्त करने का माध्यम है, वरन विचारों, अवधारणाओं, भावनाओं, कल्पनाओं के निर्माण तथा सृजन का माध्यम भी है।आप क्या क्या सोचते हैं और वैसा क्यों सोचते हैं इसमें भी भाषा का बहुत बड़ा हाथ है।साथ ही यह भी सत्य है कि विचार, अवधारणाएं, कल्पनाएं, भावनाएं भी भाषा को पनपाती हैं, विकसित करती है – अर्थात भाषा तथा मन की क्रियाओं में अन्योनाश्रित सम्बंध है।भाषा तथा उस भाषा का समाज, इन दोनो में भी अन्योनाश्रित सम्बंध है, समाज के इतिहास से तथा समाज के भविष्य से भाषा का गहरा सम्वंध रहता है।भाषा संस्कृति की शांतिवाहिनी है।

भाषा और विचार के सम्बंध में पाश्चात्य सोचके अनुसार, मध्ययुग में यह धारणा थी कि विचार तो बौद्धिक क्षमता के ढॉंचे में अन्दर बने पडे. रहते हैं, बस अभिव्यक्ति के समय उन विचारों के लिये शब्द ढूँढ़कर दिये जाते है। जब कि आधुनिक अवधारणा यह है कि विचार का बौद्धिक ढॉचा भी भाषा बनाती है, अर्थात यहॉ तक कि तार्किक सोचने का ढॉचा भी भाषा पर आधारित रहता है। इसलिये मिन्न भाषाओं में न केवल विचार भिन्न होते है, वरन उनको विचारने की शैली भी भिन्न होती है, बल्कि उनका ‘विश्वदर्शन’ भी मिन्न होता है ।हम अपने देश को पितृभूमि न कहकर मातृभूमि कहते हैं।जब हम पृथ्वी को या देश को माता कहते हैं तब उसके प्रति श्रद्धा, प्रेम और आत्मीयता अपने आप आ जाती है।

भाषा सीखना अत्यंत कठिन काम है, यह आपको तब मालूम पडे.गा जब आप अपनी मातृभाषा के अतिरिक्त कोई विदेशी भाषा सीखेंगे, स्व भाषा सीखने में अर्थात हमारी अन्य राष्ट्रभाषाएं सीखने में यह कठिनाई कम होगीहृ।तब क्या यह आश्चर्य नहीं कि हम मातृभाषा हॅसते, रोते, खेलते कूदते सीख जाते हैं, यह इसलिए कि मातृभाषा हम जीवन जीते हुए सीखते हैं और हमारी बुद्धि में भाषा के, बोलचाल के वाक्यों को सुनकर व्याकरण स्वयं बनाने या समझने की ताकत है।किन्तु यह क्षमता एक व्याकरण बनाने के बाद कम हो जाती है, इसीलिए दूसरी भाषा सीखना कठिनतर हो जाता है।और जब दो भाषाएं एक साथ बच्चे को सीखना पड़े तो, दोनों भाषाओं की व्याकरण के विषय में वह अक्सर भ्रमित रहता है – आप आजकल अपने बच्चों में यह भ्रम स्वयं देख रहे होंगे।

भाषा में ‘रचनाशीलता’ का तत्त्व बहुत अधिक रहता है।किन्तु यह रचनाशीलता व्यक्ति की भाषा में पैठ की गहराई पर निर्भर करती है, इसलिये स्वाभाविक है कि स्व विकसित मातृभाषा में व्यक्ति सर्वाधिक रचनाशील हो सकता है।इसके उदाहरण के लिये हम अपनी तुलना इज़राएल जैसे छोटे से देश से करें तो देखेंगे कि मात्र सन 1948 से उसने विज्ञान में ग्यारह नोबेल पुरस्कार जीते हैं और हमने विदेशी भाषा में पढ़ते हुए विगत डेढ .सौ वर्षों में मात्र एक ॐ इज़राएल अपनी भाषा में न केवल शिक्षा वरन सारा जीवन जीता है।

भाषा संस्कृति का सर्वाधिक महत्वपूर्ण अंग है। संस्कृति वह है जो संस्कार डालती है, संस्कृति वह क्षमताएं हैं जो हमें समाज से, हमारे जीवन के सभी आवश्यक कारकों के विषय में, विश्व में या समाज में जीवन यापन के लिये मिलती हैं।इनमें जीवनमूल्यों का सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान है, उदाहरणार्थ, हम भारतवासी, पाश्चात्य शिक्षा द्वारा ग्रसे जाने से पूर्व, स्वभावतया पदार्थवादी न होकर अध्यात्मवादी हुआ करते थे, अब हम होते तो पदार्थवादी हैं, कहें चाहे जो कुछ।क्या कोई देशप्रेमी सचमुच में चाहेगा कि हम अपनी सदियों से प्रमाणित जीवन्त संस्कृति को छोड़कर अधकचरी पाश्चात्य भोगवादी संस्कृति अपना लें ! यह विदेशी भाषा का प्रभाव तो है।

हम देखते हैं जीवन, राष्ट्र और जीवनमूल्यों का संस्कृति तथा भाषा से अटूट तथा गहरा संबन्ध है, तब इसमें क्या आश्चर्य कि विजेता अपने उपनिवेशों में साम, दाम, दण्ड, भेद से उपनिवेश की संस्कृति और भाषा पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष आक्रमण कर अपनी संस्कृति लाद देते हैं।लार्ड मैकाले ने इसी उद्देश्य से अंग्रेजी को थोपकर हममें से अधिकांश को गुल्लाम बन लिय।ॐ क्या हम उनके सफल आक्रमण से अब भी बचना चाहेंगे, यदि हां, तब कैसे बचेंगे ? जब हमें अपनी संस्कृति का ज्ञान हो, हम उसमें पले ढले हों, तभी हम अपनी संस्कृति की, अपने राष्ट्र की रक्षा कर सकेंगे, उसकी पहचान बनाकर रख सकेंगे।और जब नर्सरी से ही हम अंग्रेजी माध्यम में पढ़ेंगे तब तो हम कहने के लिये राष्ट्र प्रेम की दुहाई देते रहेंगे किन्तु विदेशी संस्कृति में ढलते जाएंगे और अपनी पहचान खोकर राष्ट्र की पहचान भी खो देंगे और विदेश का उपनिवेश बनकर शान से रहेंगे, वैसे ही जैसे एक गुलाम अपने स्वामी का ‘इंपोर्टैड थ्री पीस सूट’ पहनकर शान से इठलाकर चलता है।

विश्वमोहन तिवारी, एयर वाइस मार्शल (से . नि .) 143, सैक्टर 21, नौएडा, 201301

मंगलवार, 11 जनवरी 2011

लाल बहादुर शास्त्री (जीवन आदर्श, प्रतिभा)

लाल बहादुर शास्त्री (जीवन आदर्श, प्रतिभा) 

लाल बहादुर शास्त्री जी का जन्म शारदा श्रीवास्तव प्रसाद, स्कूल अध्यापक व रामदुलारी देवी. के घर मुगलसराय(अंग्रेजी शासन के एकीकृत प्रान्त), में हुआ जो बादमें अलाहाबाद [1] के रेवेनुए ऑफिस में बाबू हो गए ! बालक जब 3 माह का था गंगा के घाट पर माँ की गोद से फिसल कर चरवाहे की टोकरी (cowherder's basket) में जा गिरा! चरवाहे, के कोई संतान नहीं थी उसने बालक को इश्वर का उपहार मान घर ले गया ! लाल बहादुर के माता पिता ने पुलिस में बालक के खोने की सुचना लिखी तो पुलिस ने बालक को खोज निकला और माता पिता को सौंप दिया[2].
बालक डेढ़ वर्ष का था जब पिता का साया उठने पर माता उसे व उसकी 2 बहनों के साथ लेकर मायके चली गई तथा वहीँ रहने लगी[3]. लाल बहादुर 10 वर्ष की आयु तक अपने नाना हजारी लाल के घर रहे! तथा मुगलसराय के रेलवे स्कुल में कक्षा IV शिक्षा ली, वहां उच्च विद्यालय न होने के कारण बालक को वाराणसी भेजा गया जहाँ वह अपने मामा के साथ रहे, तथा आगे की शिक्षा हरीशचन्द्र हाई स्कूल से प्राप्त की ! बनारस रहते एक बार लाल बहादुर अपने मित्रों के साथ गंगा के दूसरे तट मेला देखने गए! वापसी में नाव के लिए पैसे नहीं थे! किसी मित्र से उधार न मांग कर, बालक लाल बहादुर नदी में कूदते हुए उसे तैरकर पार कर गए[4].
बाल्यकाल में, लाल बहादुर पुताकें पढ़ना भाता था विशेषकर गुरु नानक के verses. He revered भारतीय राष्ट्रवादी, समाज सुधारक एवं स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक .वाराणसी 1915 में महात्मा  गाँधी का भाषण सुनने के पश्चात् लाल बहादुर ने अपना जीवन देश सेवा को समर्पित कर दिया[5] !  महात्मा  गाँधी के असहयोग आन्दोलन 1921 में लाल बहादुर ने निषेधाज्ञा का उलंघन करते प्रदर्शनों में भाग लिया ! जिस पर उन्हें बंदी बनाया गया किन्तु अवयस्क होने के कारण छूट गए[6] ! फिर वे काशी विद्यापीठ वाराणसी में भर्ती हुए! वहां के 4 वर्षों में वे डा. भगवान दास के lectures on philosophy से अत्यधिक प्रभावित हुए! तथा राष्ट्रवादी में भर्ती हो गए ! काशी विद्यापीठ से 1926, शिक्षा पूरी करने पर उन्हें शास्त्री की उपाधि से विभूषित किया गया जो विद्या पीठ की सनातक की उपाधि  है, और उनके नाम का अंश बन गया[3] ! वे सर्वेन्ट्स ऑफ़ द पीपल सोसाईटी आजीवन सदस्य बन कर मुजफ्फरपुर में हरिजनॉं के उत्थान में कार्य करना आरंभ कर दिया बाद में संस्था के अध्यक्ष भी बने[8].
1927 में, जब शास्त्री जी का शुभ विवाह मिर्ज़ापुर की ललिता देवी से संपन्न हुआ तो भारी भरकम दहेज़ का चलन था किन्तु शास्त्रीजी ने केवल एक चरखा व एक खादी  का कुछ गज का टुकड़ा  ही दहेज़ स्वीकार किया ! 1930 में,महात्मा  गाँधी के नमक सत्याग्रह के समय वे स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े, तथा ढाई वर्ष का कारावास हुआ[9]. एकबार, जब वे बंदीगृह में थे, उनकी एक बेटी गंभीर रूप से बीमार हुई तो उन्हें स्वतंत्रता संग्राम में भाग न लेने की शर्त पर 15 दिवस की सशर्त छुट्टी दी गयी ! परन्तु उनके घर पहुँचने से पूर्व ही बेटी का निधन हो चूका था ! बेटी के अंतिम संस्कार पूरे कर, वे अवधि[10] पूरी होने से पूर्व ही स्वयं कारावास लौट आये !  एक वर्ष पश्चात् उन्होंने एक सप्ताह के लिए घर जाने की अनुमति मांगी जब उनके पुत्र को influenza हो गया था ! अनुमति भी मिल गयी किन्तु पुत्र एक सप्ताह मैं निरोगी नहीं हो पाया तो अपने परिवार के अनुग्रहों (pleadings, के बाद भी अपने वचन के अनुसार वे कारावास लौट आये[10].
8 अगस्त 1942, महात्मा गाँधी ने मुंबई के गोवलिया टेंक में अंग्रेजों भारत छोडो की मांग पर भाषण दिया ! शास्त्री जी जेल से छूट कर सीधे पहुंचे जवाहरलाल नेहरु के hometown अल्लहाबाद और आनंद  भवन से एक सप्ताह स्वतंत्रता सैनानियों को निर्देश देते रहे ! कुछ दिन बाद वे फिर बंदी बनाकर कारवास भेज दिए गए और वहां रहे 1946 तक[12], शास्त्री जी कुलमिला कर 9 वर्ष जेल में रहे [13]. जहाँ वे पुस्तकें पड़ते रहे और इसप्रकार पाश्चात्य western philosophers, revolutionaries and social reformer की कार्य प्रणाली से अवगत होते रहे ! तथा मारी कुरी की autobiography का हिंदी अनुवाद भी किया[9].
आज़ादी के बाद 
भारत आजाद होने पर, शास्त्री जी अपने गृह प्रदेश उत्तर प्रदेश के संसदीय सचिव नियुक्त किये गए! गोविन्द  बल्लभ  पन्त के मंत्री मंडल के पुलिस व यातायात मंत्री बनकर पहली बार महिला कन्डक्टर की नियुक्ति की ! पुलिस को भीड़ नियंत्रण हेतु उन पर लाठी नहीं पानी की बौछार का उपयोग के आदेश दिए[14].
1951 में राज्य सभा सदस्य बने तथा कांग्रेस महासचिव के नाते चुनावी बागडोर संभाली, तो 1952, 1957 व 1962 में प्रत्याशी चयन, प्रचार द्वारा जवाहरलाल  नेहरु को संसदीय चुनावों में भारी बहुमत प्राप्त हुआ! केंद्र में 1951 से 1956 तक रेलवे व यातायात मंत्री रहे, 1956 में महबूबनगर की रेल दुर्घटना में 112 लोगों की मृत्यु के पश्चात् भेजे शास्त्रीजी के त्यागपत्र को नेहरुजी ने स्वीकार नहीं किया[15]! किन्तु 3 माह पश्चात् तमिलनाडू के अरियालुर दुर्घटना (मृतक 114) का नैतिक व संवैधानिक दायित्व मान कर दिए त्यागपत्र को स्वीकारते नेहरूजी ने कहा शास्त्री जी इस दुर्घटना के लिए दोषी नहीं[3] हैं किन्तु इससे संवैधानिक आदर्श स्थापित करने का आग्रह है ! शास्त्री जी के अभूत पूर्व निर्णय की की देश की जनता ने भूरी भूरी प्रशंसा की ! 
1957 में, शास्त्री जी संसदीय चुनाव के पश्चात् फिर मंत्रिमंडल में लिए गए, पहले यातायात व संचार मंत्री, बाद में वाणिज्य व उद्योग मंत्री[7] तथा 1961 में गृह मंत्री बने[3] तब क.संथानम[16] 
की अध्यक्षता में भ्रष्टाचार निवारण कमिटी गठित करने में भी विशेष भूमिका रही ! 
प्रधान मंत्री 
लाल बहादुर शास्त्री  जी  का नेतृत्व 
27 मई 1964 जवाहरलाल नेहरु की मृत्यु से उत्पन्न रिक्तता को 9 जून को भरा गया जब कांग्रेस अध्यक्षक. कामराज ने  प्रधान मंत्री पद के लिए एक मृदु भाषी, mild-mannered नेहरूवादी शास्त्री जी को उपयुक्त पाया तथा इसप्रकार पारंपरिक दक्षिणपंथी मोरारजी देसाई का विकल्प स्वीकार हुआ ! प्रधान मंत्री के रूप में राष्ट्र के नाम प्रथम सन्देश में शास्त्री जी ने को कहा[17]
हर राष्ट्र के जीवन में एक समय ऐसा आता है, जब वह इतिहास के चौराहे पर खड़ा होता है और उसे अपनी दिशा निर्धारित करनी होती है !.किन्तु हमें इसमें कोई कठिनाई या संकोच की आवश्यकता नहीं है! कोई इधर उधर देखना नहीं हमारा मार्ग सीधा व स्पष्ट है! देश में सामाजिक लोकतंत्र के निर्माण से सबको स्वतंत्रता व वैभवशाली बनाते हुए विश्व शांति तथा सभी देशों के साथ मित्रता !
शास्त्री जी विभिन्न विचारों में सामंजस्य निपुणता के बाद भी अल्प अवधि के कारण देश के अर्थ संकट व खाद्य संकट का प्रभावी हल न कर पा रहे थे ! परन्तु जनता में उनकी लोकप्रियता व सम्मान अत्यधिक था जिससे उन्होंने देश में हरित क्रांति लाकर खाली गोदामों को भरे भंडार में बदल दिया ! किन्तु यह देखने के लिए वो जीवित न रहे, पाकिस्तान से 22 दिवसीय युद्ध में, लाल बहादुर शास्त्री जी ने नारा दिया "जय जवान जय किसान" देश के किसान को सैनिक समान बना कर देश की सुरक्षा के साथ अधिक अन्न उत्पादन पर बल दिया! हरित क्रांति व सफेद (दुग्ध) क्रांति[16] के सूत्र धार शास्त्री जी अक्तू.1964 में कैरा जिले में गए उससे प्रभावित होकर उन्होंने आनंद का देरी अनुभव से सरे देश को सीख दी तथा उनके प्रधानमंत्रित्व काल 1965 में नेशनल देरी डेवेलोपमेंट बोर्ड गठन हुआ ! 
समाजवादी होते हुए भी उन्होंने अपनी अर्थव्यवस्था को किसी का पिछलग्गू नहीं बनाया[16]. अपने कार्य काल 1965[7] में उन्होंने भ्रमण किया रूसयुगोस्लावियाइंग्लैंडकनाडा व बर्मा
पाकिस्तान से युद्ध 
भारत पाकिस्तानी युद्ध 1965
पाकिस्तान ने आधे कच्छ, पर अपना अधिकार जताते अपनी सेनाएं अगस्त 1965 में भेज दी, which skirmished भारतीय टेंक की कच्छ की मुठभेढ़ पर लोक सभा में, शास्त्री जी का वक्तव्य[17]:
“ अपने सीमित संसाधनों के उपयोग में हमने सदा आर्थिक विकास योजना तथा परियोजनाओं को प्रमुखता दी है, अत: किसी भी चीज को सही परिपेक्ष्य में देखने वाला कोई भी समझ सकता है कि भारत की रूचि सीमा पर अशांति अथवा संघर्ष का वातावरण बनाने में नहीं हो सकती !... इन परिस्थितियों में सरकार का दायित्व बिलकुल स्पष्ट है और इसका निर्वहन पूर्णत: प्रभावी ढंग से किया जायेगा ...यदि आवश्यकता पड़ी तो हम गरीबी में रह लेंगे किन्तु देश कि स्वतंत्रता पर आँच नहीं आने देंगे!  ”
  ( It would, therefore, be obvious for anyone who is prepared to look at things objectively that India can have no possible interest in provoking border incidents or in building up an atmosphere of strife... In these circumstances, the duty of Government is quite clear and this duty will be discharged fully and effectively... We would prefer to live in poverty for as long as necessary but we shall not allow our freedom to be subverted.)
पाकिस्तान कि आक्रामकता का केंद्र है कश्मीर. जब सशस्त्र घुसपैठिये पाकिस्तान से जम्मू एवं कश्मीर राज्य में घुसने आरंभ हुए, शास्त्री जी ने पाकिस्तान को यह स्पष्ट कर दिया कि ईंट का जवाब पत्थर से दिया जायेगा[18] अभी सित.1965 में ही पाक सैनिकों सहित सशस्त्र घुसपैठियों ने सीमा पार करते समय सब अपने अनुकूल समझा होगा, किन्तु ऐसा था नहीं और भारत ने भी युद्ध विराम रेखा (अब नियंत्रण रेखा) के पार अपनी सेना भेज दी है तथा युद्ध होने पर पाकिस्तान को लाहौर के पास अंतर राष्ट्रीय सीमा पर करने कि चेतावनी भी दे दी है! टेंक महा संग्राम हुआ पंजाब में , and while पाकिस्तानी सेनाओं को कहीं लाभ हुआ, भारतीय सेना ने भी कश्मीर का हाजी पीर का महत्त्व पूर्ण स्थान अधिकार में ले लिया है, तथा पाकिस्तानी शहर लाहौर पर सीधे प्रहार करते रहे! 
17 सित.1965, भारत पाक युद्ध के चलते भारत को एक पत्र  चीन से मिला. पत्र में, चीन ने भारतीय सेना पर उनकी सीमा में सैन्य उपकरण लगाने का आरोप लगाते, युद्ध की धमकी दी अथवा उसे हटाने को कहा जिस पर शास्त्री जी ने घोषणा की "चीन का आरोप मिथ्या है! यदि वह हम पर आक्रमण करेगा तो हम अपनी अपनी संप्रभुता की रक्षा करने में सक्षम हैं"[19]. चीन ने इसका कोई उत्तर नहीं दिया किन्तु भारत पाक युद्ध में दोनों ने बहुत कुछ खोया है! .
भारत पाक युद्ध समाप्त 23 सित.  1965 को संयुक्त राष्ट्र-की युद्ध विराम घोषणा से हुआ. इस अवसर पर प्र.मं.शास्त्री जी ने कहा[17]:
“ दो देशों की सेनाओं के बीच संघर्ष तो समाप्त हो गया है संयुक्त राष्ट्र- तथा सभी शांति चाहने वालों के लिए अधिक महत्वपूर्ण है is to bring to an end the deeper conflict... यह कैसे प्राप्त किया जा सकता है ? हमारे विचार से, इसका एक ही हल है शांतिपूर्ण सहा अस्तित्व! भारत इसी सिद्धांत पर खड़ा है; पूरे विश्व का नेतृत्व करता रहा है! उनकी आर्थिक व राजनैतिक विविधता तथा मतभेद कितने भी गंभीर हों, देशों में शांतिपूर्ण सहस्तित्व संभव है !  ” 
ताश कन्द का काण्ड 
युद्ध विराम के बाद, शास्त्री जी तथा  पाकिस्तानी राष्ट्रपति मुहम्मद अयूब खान वार्ता के लिए ताश कन्द (अखंडित रूस, वर्तमान उज्बेकिस्तान) अलेक्सेई कोस्य्गिन के बुलावे पर 10 जन.1966 को गए, ताश कन्द समझौते पर हस्ताक्षर किये! शास्त्री जी को संदेह जनक परिस्थितियों में मृतक बताते, अगले दिन/रात्रि के 1:32 बजे [7]  हृदयाघट का घोषित किया गया ! यह किसी सरकार के प्रमुख की सरकारी यात्रा पर विदेश में मृत्यु की अनहोनी घटना है[20]
शास्त्री जी की मृत्यु का रहस्य ?
शास्त्री जी की रहस्यमय मृत्यु पर उनकी विधवा पत्नी ललिता शास्त्री  कहती रही कि उनके पति को विष दिया गया है. कुछ उनके शव का नीला रंग, इसका प्रमाण बताते हैं.शास्त्री जी को विष देने के आरोपी रुसके रसोइये को बंदी भी बनाया गया किन्तु वो प्रमाण के अभाव में बच गया[21]
2009 में, जब अनुज धर, लेखक CIA's Eye on South Asia, RTI में  (Right to Information Act) प्रधान मंत्री कार्यालय से कहा, कि शास्त्री जी की मृत्यु का कारण सार्वजानिक किया जाये, विदेशों से सम्बन्ध बिगड़ने की बात कह कर टाल दिया गया देश में असंतोष फैलने व संसदीय विशेषाधिकार का उल्लंघन भी बताया गया[21]
PMO ने इतना तो स्वीकार किया कि शास्त्री जी कि मृत्यु से सम्बंधित एक पत्र कार्यालय के पास है! सरकार ने यह भी स्वीकार किया कि शव की रूस USSR में post-mortem examination जाँच नहीं की गई, किन्तु शास्त्री जी के वैयक्तिगत चिकित्सक  डा. र.न.चुघ ने जाँच कर रपट दी थी! किस प्रकार हर सच को छुपाने का मूल्य लगता है और सच का झूठ / झूठ का सच यहाँ सामान्य प्रक्रिया है कुछ भ हो सकता है[21]
स्मृतिचिन्ह 
आजीवन सदाशयता व विनम्रता के प्रतीक माने गए, शास्त्री जी एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया, व दिल्ली के "विजय घाट" उनका स्मृति चिन्ह बनाया गया ! अनेकों शिक्षण सस्थान, शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासनिक संसथान National Academy of Administration (Mussorie) तथा शास्त्री इंडो -कनाडियन इंस्टिट्यूट अदि उनको समर्पित हैं[22]
"यह राष्ट्र जो कभी विश्वगुरु था,आजभी इसमें वह गुण,योग्यता व क्षमता विद्यमान है! आओ मिलकर इसे बनायें- तिलक