Desh Bhakti ke Geet Vedio

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यह राष्ट्र जो कभी विश्वगुरु था, आजभी इसमें वह गुण,योग्यता व क्षमता विद्यमान है। किन्तु प्रकृति के संसाधनों व उत्कृष्ट मानवीयशक्ति से युक्त इस राष्ट्रको काल का ग्रहण लग चुका है। जिस दिन यह ग्रहणमुक्त हो जायेगा, पुनः विश्वगुरु होगा। राष्ट्रोत्थानका यह मन्त्र पूर्ण हो। आइये, युगकी इस चुनोतीको भारतमाँ की संतान के नाते स्वीकार कर हम सभी इसमें अपना योगदान दें। निस्संकोच ब्लॉग पर टिप्पणी/अनुसरण/निशुल्क सदस्यता व yugdarpan पर इमेल/चैट करें,संपर्कसूत्र- तिलक संपादक युगदर्पण 09911111611, 9999777358.

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शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

पं. मदनमोहन मालवीय का सांस्कृतिक अवदान

पं. मदनमोहन मालवीय का सांस्कृतिक अवदान

डॉ. विनय मिश्र
श्रीमद्भगवदगीता में उल्लेख है - यदि
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत
अभ्युत्थानऽधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यऽहम्
अर्थात् जब भी धर्म का पराभव एवं अधर्म का विस्तार होता है तब तब कोई महाशक्ति धर्म की स्थापना एवं मानवीय मूल्यों को पुनर्जीवित करने के लिए पृथ्वी पर अवतरित होती है। पराधीन राष्ट्र को स्वतंत्र कराने एवं नव निर्माण के संकल्प का बीजवपन भारतीय सांस्कृतिक जीवन मूल्यों की उर्वरा भूमि पर करने वाले युगपुरुष महामना पं. मदनमोहन मालवीय का जन्म 25 दिसम्बर 1861 ई. में प्रयाग में हुआ था। यह वह समय था जब अधर्म, अशांति तथा गुलामी की बेडयों में देश जकडा हुआ था। भौतिकवादी दुर्वासनाजनित कल्पनाओं की बयार हर ओर बह रही थी, अध्यात्म से अनुप्राणित सरगम की जगह वातावरण में असत्य एवं अत्याचार से संचालित राजनीति एवं रूढयों की प्रतिष्ठा थी एवं अनैतिकता का आचरण मनुष्य मात्र का सहज कार्य व्यापार था, कुछ ऐसे ही देश काल में भारतीय संस्कृति की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए, नैतिक मूल्यों के उन्नयन के लिये, असत्य प्रेरित भौतिकवादिता के उन्मूलन के लिये, वेदों और शास्त्रों में निहित धार्मिक सिद्धान्तों के प्रचार प्रसार के लिए, वसुधैव कुटुम्बकम् की महत् भावना से अनुप्राणित परहित के लिए त्याग एवं प्रेम को स्वीकृति देने वाले गंगाजल के समान स्वच्छ व निर्मल व्यक्तित्व के धनी पं. मदनमोहन मालवीय का आविर्भाव हुआ। मालवीय जी प्राचीन भारतीय संस्कृति के प्रबल समर्थक थे, अतः भारतीय संस्कृति की सेवा करने का मूलमंत्र व प्रेरणा स्रोत एक श्लोक से ग्रहण करते हुए उन्होंने अपना सारा जीवन सनातन जीवन मूल्यों के उन्नयन में लगा दिया - 
न त्वहं कामये राज्यं, न स्वर्गं नाऽपुनभर्वम्।
कामये दुःखतप्तानां, प्राणिनामार्तिंनाशनम।।
अर्थात् न मुझे राज्यप्राप्ति की इच्छा है, न स्वर्ग की और न ही फिर से मनुष्य देह धारण करने की। यदि कोई कामना है तो बस यही कि मैं किस प्रकार दुःखों में तपते प्राणियों की पीडा का हरण कर सकूँ। 
एक सत्यनिष्ठ उपासक की तरह मालवीय जी ने देश के नवयुवकों का आह्वान करते हुए कहा - ’’सब प्राणियों के उपकार के लिए, शारीरिक शिक्षा और धर्म के महत्त्व को समझो। गाँव गाँव में पाठशालाएँ, खेलकूद के मैदान और अखाडे खोलो।‘‘ यह कथन आज के सन्दर्भ में भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना कि पहले था क्योंकि वर्तमान जीवन के दमघोटूँ एवं संत्रास भरे वातावरण से मुक्त होकर, सौन्दर्य एवं कल्पना के लोक में मनुष्य तभी विचरण कर सकता है। जब वह प्रकृति द्वारा प्राप्त संपूर्ण क्षमताओं एवं शक्तियों को पहचानकर अपने लक्ष्य की प्राप्ति में निरंतर क्रियाशील बना रहे।
हिन्दू धर्म एवं भारतीय संस्कृति की यही विशेषता रही है कि जीवन से संबंधित प्रश्नों का उत्तर ढूँढने के लिए अनगिनत महापुरुषों एवं मनीषियों ने अपना पूरा जीवन उत्सर्ग कर दिया। पं. मदनमोहन मालवीय भी ऐसे ही भारत रत्नों में से एक थे। वे अपने समय के उन प्रधान नेताओं में से थे जिन्होंने ’हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्तान‘ को सर्वोच्च स्थान पर स्थापित कराया। हिन्दी साहित्य सम्मलेन, प्रयाग जैसी साहित्यिक संस्थाओं की स्थापना एवं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय जैसे शिक्षा केन्द्रों के निर्माण द्वारा सार्वजनिक हिन्दी आंदोलन का नेतृत्व कर मालवीय जी ने हिन्दी की जो सेवा की है वह असाधारण है। उनके सद्प्रयत्नों से ही हिन्दी को यश, विस्तार और उच्च पद मिला। वे उच्च कोटि के विद्वान्, वक्ता और लेखक थे। यद्यपि लोकमान्य तिलक, राजेन्द्र बाबू और जवाहरलाल नेहरू के मौलिक या अनूदित साहित्य की तरह मालवीय जी ने नहीं लिखा अतः उनके कृतित्व का आकलन करते हुए यह मानना होगा कि हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास में उनका योगदान क्रियात्मक अधिक परन्तु रचनात्मक साहित्यकार के रूप में कम है। उनके हिन्दी प्रेम को प्रमाणित करते हुए उनके भाषण का एक अंश प्रस्तुत हैं - ’’भारतीय विद्यार्थियों के मार्ग में आने वाली कठिनाइयों का कोई अंत नहीं है। सबसे बडी कठिनाई यह है कि शिक्षा का माध्यम हमारी मातृभाषा न होकर एक दुरूह विदेशी भाषा है। सभ्य संसार के किसी भी अन्य भाग में जन समुदाय की शिक्षा का माध्यम विदेशी भाषा नहीं है।‘‘ मालवीय जी विशुद्ध हिन्दी के पक्ष में थे और हिन्दी और हिन्दुस्तानी को एक नहीं मानते थे। सन् 1916 में हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना ही उनकी शिक्षा और साहित्य सेवा का वह अमिट शिलालेख है जो इतिहास के पन्नों पर स्वर्णाक्षरों में सदा चमकता रहेगा। इसके अतिरिक्त ’सनातन धर्मसभा‘ का नेता होने के कारण देश के विभिन्न भागों में उन्होंने सनातन धर्म कॉलेजों की स्थापना की प्रेरणा प्रदान की।
सार्वजनिक जीवन में मालवीय जी का पदार्पण विशेषकर दो घटनाओं के कारण हुआ पहला यह कि अंग्रेजी और उर्दू के बढते प्रभाव के कारण हिन्दी भाषा को क्षति न पहुँचे, इसके लिए जनमत संग्रह करना तथा दूसरा भारतीय सभ्यता और संस्कृति के मूल तत्त्वों को प्रोत्साहन देना।
हिन्दी की सबसे बडी सेवा मालवीय जी ने इस रूप में की कि उन्होंने उत्तरप्रदेश की अदालतों और दफ्तरों में हिन्दी को व्यवहार योग्य भाषा के रूप में स्वीकृत कराया। इससे पहले केवल उर्दू ही सरकारी दफ्तरों और अदालतों की भाषा थी। सन् 1893 में मालवीय जी ने काशी नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया और वे इस सभा के प्रवर्तकों में से थे।
यद्यपि धार्मिक एवं सामाजिक विषयों पर उनके आर्यसमाज से गहरे मतभेद थे क्योंकि वे समस्त कर्मकाण्ड, रीतिरिवाज एवं मूर्तिपूजा आदि को हिन्दू धर्म का मौलिक अंग मानते थे फिर भी हिन्दी के प्रश्न पर दोनों का मतैक्य था। मालवीय जी एक सफल पत्रकार भी थे और हिन्दी पत्रकारिता से ही उन्होंने जीवन के कर्म क्षेत्र में पदार्पण किया। ’लीडर‘ और हिन्दुस्तान टाइम्स‘ की स्थापना का श्रेय भी मालवीय जी को है। कुछ दिनों को लिए उन्होंने ’मर्यादा‘ नाम से एक समाचार पत्र भी निकाला। वे पत्रों के द्वारा जनता में प्रचार करने में बहुत विश्वास रखते थे और स्वयं कई वर्षों तक अनेक पत्रों के सम्पादक भी रहे। कई साहित्यिक एवं धार्मिक संस्थाओं से भी उनका सम्फ रहा। सनातन धर्म सभा के सिद्धान्तों को प्रचारित करने के लिए मालवीय जी के प्रयत्नों से ही काशी से ’सनातन धर्म‘ नामक साप्ताहिक समाचार पत्र का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। इस तरह से हिन्दी भाषा के स्तर को ऊँचा करने का उनका सद्प्रयास रंग लाया और शिक्षा सुधार के क्षेत्र में मालवीय जी के प्रयत्न अविस्मरणीय हो गये।
वे पुस्तकीय शिक्षा की बजाय प्रौद्योगिक शिक्षा के समर्थक थे। वे चाहते थे कि वैज्ञानिक ढंग की शिक्षा अपने देश में भी प्रारम्भ की जाये और प्रयोगशाला तथा वर्कशाप में विद्यार्थियों को अपने हाथों से प्रयोग करने का अभ्यास कराया जाये, उनमें शिक्षा से प्रेरणा की शक्ति उत्पन्न की जाये, उनके ज्ञान को यथातथ्य तथा जीवनोपयोगी बनाया जाये। उनकी धारणा थी कि भारत अपने प्राचीन गौरव को प्राप्त करने में तब तक सर्वथा असमर्थ रहेगा जब तक वह वर्तमान वैज्ञानिक अन्वेषण का अध्ययन नियमित और अनिवार्य नहीं बनाता। वे प्राचीन आयुर्वेद के साथ अर्वाचीन शल्य शिक्षा का मेल, आयुर्वेदिक औषधियों का वैज्ञानिक परीक्षण तथा उन पर अनुसंधान, विभिन्न विषयों पर प्राच्य और आधुनिक ज्ञान का तुलनात्मक अध्ययन, प्राचीन भारतीय संस्कृति, दर्शन साहित्य तथा इतिहास के गहन अध्ययन-अध्यापन के साथ-साथ आधुनिक मनोविज्ञान, नीतिविज्ञान, दर्शनशास्त्र, अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र का अध्ययन-अध्यापन, वेद-वेदांत, संस्कृत साहित्य और वाङ्मय की शिक्षा के अतिरिक्त आधुनिक ज्ञान-विज्ञान, धातु विज्ञान, खनन विज्ञान, विद्युत एवं यांत्रिक इंजीनियरिंग, कृषि विज्ञान आदि विषयों का अध्ययन-अध्यापन भी चाहते थे। इस प्रकार मुख्य रूप से सामाजिक स्थिरता एवं समरसता हेतु मालवीय जी प्राचीन शिक्षा व्यवस्था तथा परिवर्तन और आधुनिकता हेतु आधुनिक वैज्ञानिक प्राकृतिक विज्ञान की शिक्षा व्यवस्था के पक्षधर थे क्योंकि उनके विचार में ’व्यक्ति‘ में मानवोचित विकास तथा प्रगति एवं कार्यशीलता के लिए उपर्युक्त शिक्षा आवश्यक है। उनका विचार था कि धर्म, दर्शन तथा कला की शिक्षा मनुष्य के सिर की भाँति है और विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी की शिक्षा उसके धड के समान
है, अतः उक्त दोनों प्रकार की शिक्षा एक दूसरे की पूरक है। मालवीय जी शिक्षा को चरित्र विकास का साधन मानते थे और चाहते थे कि शिक्षा द्वारा ’व्यक्ति‘ का सर्वांगीण विकास हो। वे सह शिक्षा के समर्थक थे। उनके अनुसार ’’स्त्रियों में पुरुषोचित और पुरुषों में स्त्रियोचित गुण समवयस्क सह शिक्षा द्वारा ही आ सकता है।‘‘ उस जमाने में इतने प्रगतिशील विचार रखना मालवीय जी की अत्याधुनिक व दूरदर्शितापूर्ण वैचारिकता का प्रमाण है।
मालवीय जी शिक्षा के साथ-साथ चरित्र निर्माण पर भी जोर देते थे। कहा भी गया है चरित्र निर्माणं ज्ञान विज्ञानात् श्रेष्ठतरम्। चरित्र के महत्त्व के प्रसंग में मालवीय जी ने एक जगह लिखा है - ’’धर्म, चरित्र निर्माण तथा सांसारिक सुख का सीधा मार्ग है। इससे मनुष्यों में उच्चकोटि की निःस्वार्थ सेवा की भावना आती है जिससे समाज तथा राष्ट्र का कल्याण होता है। उनके अनुसार शिक्षा प्रणाली का प्रधान ध्येय नवयुवकों को योग्य नागरिक बनाना तथा जनता की बुद्धि का विकास करना है।‘‘
मालवीय जी स्त्री शिक्षा के भी प्रबल हिमायती थे। इस सम्बन्ध में उन्होंने कहा था कि ’’पुरुषों की शिक्षा से स्त्रियों की शिक्षा का अधिक महत्त्व है क्योंकि वे ही भारत की भावी सन्तति की माता हैं, वे हमारे भावी राजनीतिज्ञों, विद्वानों, तत्त्वज्ञानियों, व्यापार तथा कला-कौशल के नेताओं आदि की प्रथम शिक्षिका हैं, उनकी शिक्षा का प्रभाव भारत के भावी नागरिकों की शिक्षा पर विशेष रूप से पडेगा।‘‘ महाभारत में कहा गया है - ’’माता के समान कोई शिक्षक नहीं है।‘‘ इस प्रकार स्त्री शिक्षा के संदर्भ में मालवीय जी ने एक परिवर्तनवादी आधुनिक विचारदृष्टि तत्कालीन समाज के सामने रखी। मालवीय जी की शैक्षणिक विचारधारा प्रगतिशील और आधुनिक है जो एक दूरदर्शी शिक्षाशास्त्री के रूप में भी उनकी उल्लेखनीय भूमिका को राष्ट्रीय आन्दोलन के परिप्रेक्ष्य में स्थापित करती है।
पं. मदनमोहन मालवीय भारतीय संस्कृति के अद्वितीय उपासक एवं प्रतीक पुरुष थे। ब्रह्मचर्य पालन एवं गायत्री को स्वदेश भक्ति का अभिन्न अंग मानते हुए उन्होंने युवकों को भीष्म के समान व्रतनिष्ठ, कृष्ण के समान नीतिज्ञ एवं परशुराम के समान अन्याय एवं पराधीनता की बेडयों को काटने के लिए अपेक्षित आक्रोश का आह्वान किया। वे मानते थे कि बगैर धार्मिक उत्थान के राष्ट्र का उत्थान असंभव है। महामना द्वारा प्रतिपादित धर्म किसी संकीर्णवादी सांप्रदायिक दृष्टि का नहीं अपितु मानवमात्र को आत्मवत् देखने के विचार का पक्षधर था। अपने एक लेख में इसी दृष्टि के प्रतिपादन के लिए उन्होंने शास्त्र निर्दिष्ट एक श्लोक का उल्लेख किया है।
मातृवत्परदारेषु, परद्रव्येषु लोष्ठवत्
आत्मवत्सर्वभूतेष, यः पश्यति स पण्डितः 
निष्कर्षतः महामना मालवीय जी के सांस्कृतिक अवदान का मूल्यांकन करते हुए हम कह सकते हैं कि ’स्व‘ धर्म के प्रति अच्युत रहकर अपने धवल सबल चरित्र द्वारा अपने उदात्त मानस व प्रगतिशील प्रज्ञा दृष्टि का प्रमाण देते हुए मालवीय जी ने प्राचीन भारत की सभ्यता और संस्कृति में जो कुछ महान् व गौरवपूर्ण था उन जीवनदायी मानवीय मूल्यों की पुनर्स्थापना की तथा जन मन में सांस्कृतिक गरिमा जगाने हेतु विभिन्न कला, धर्म एवं शिक्षण की सरणियों एवं विधाओं से नवजागरण का शंखनाद किया।
यह राष्ट्र जो कभी विश्वगुरु था,आजभी इसमें वह गुण,योग्यता व क्षमता विद्यमान है! आओ मिलकर इसे बनायें- तिलक

गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

मनमोहनी मुखौटा व इच्छाशक्ति

युग दर्पण सम्पादकीय
 विगत 3 वर्षों से 2 जी व अन्य घोटाले हुए पर आंख बंद रखने व बचाव करनेवाले प्र.मं. डॉ. मनमोहन सिंह ने शुचिता का मुखौटा लगा ही लिया व बुराड़ी में अपने भाषण से हमें आभास दिला दिया कि भ्रष्टाचार अभी भी एक मुद्दा है और मनमोहन सिंह सरकार उसे समाप्त करने की इच्छुक है। कांग्रेस महाधिवेशन में प्रधानमंत्री ने सिद्धांतों की राजनीति करते हुए केवल भ्रष्टाचार की शंका पर त्यागपत्र देने की परम्परा बताई, यह जानकार खुशी हुई। यह भी आवाज़ आइ, हम विपक्ष की तरह नहीं है कि किसी राज्य में घोटाले पर घोटाले हों और मुख्यमंत्री पद पर बने रहें। जेपीसी की मांग पर एकजुट विपक्ष में दरार डालने के लिए प्रधानमंत्री ने लोक लेखा समिति (पीएसी) के सामने प्रस्तुत होने का दांव खेला। उन्होंने कहा कि`मैं साफतौर पर कहना चाहता हूं कि मेरे पास कुछ भी छिपाने को नहीं है।  प्रधानमंत्री पद को किसी भी तरह के संदेह से परे होना चाहिए। इसलिए पुरानी परम्परा न होते हुए भी मैं लोलेसमिति (पीएसी) के सामने प्रस्तुत होने को तैयार हूं। इस मनमोहनी मुखौटे ने तो मनमोह लिया किन्तु अब इसके पीछे छिपे वास्तविक रूप को भी देखें।'
  माना कि यहां सीधे सीधे प्रधानमंत्री पर भ्रष्टाचार के आरोप नहीं। किसी ने भी यह नहीं कहा कि डॉ. मनमोहन सिंह ने भ्रष्टाचार के कृत्य किए हैं। जेपीसी की मांग 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले को लेकर है। प्रश्न सीधा है, क्या मनमोहन सिंह सरकार पूरी ईमानदारी से इस घोटाले की जांच करवाने को तैयार है या नहीं? संसद भारत की सर्वोच्च जनता की अदालत है। सांसद इसीलिए भेजे जाते हैं कि जनता की आवाज को संसद में उठा सकें। जब संसद के बहुमत सदस्य चाहते हैं कि 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच जेपीसी करे तो सरकार को इसमें क्या आपत्ति है? हम प्रधानमंत्री जी से क्षमा चाहेंगे। अपने भाषण में उन्होंने प्रधानमंत्री पद की निष्ठा की महत्ता बताई, किन्तु प्रश्न निष्ठा का नहीं, नियत का है, इच्छाशक्ति का है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्रवाई की बातें कहना और ऐसा करने की इच्छाशक्ति दिखाने में अन्तर होता है।और यहाँ यह अन्तर स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा है। 
डॉ. मनमोहन सिंह के इस कथन से विपरीत कि मात्र संदेह होने पर उनके नेताओं ने पद त्याग दिया, वास्तविकता यह है कि ए. राजा से तब त्यागपत्र लिया गया जब इसके अतिरिक्त और कोई चारा नहीं रह गया था। जब मीडिया और विपक्ष राजा के विरुद्ध कार्रवाई की मांग कर रहा था, तब कांग्रेसी देश को यह समझाने में लगे थे कि राजा को त्यागपत्र देने की आवश्यकता क्यों नहीं है? हम डॉ. सिंह को याद दिलाना चाहेंगे कि आपने स्वयं भी राजा का बचाव किया था। शशि थरूर के मामले में भी ऐसा ही हुआ था और जहां तक अशोक चव्हाण की बात है वह तो रंगे हाथ पकड़े गए थे। विवाद को ठंडे बस्ते में डालने के प्रयास में कांग्रेस ने चव्हाण को हटाया था, न कि देश का हित ध्यान में रखकर। 
  लोलेस (पीएसी) के पास सीमित अधिकार होते हैं। सामान्यत: कार्यपालिका से जुड़े सरकारी लोग संबंधित फाइलें ले जाकर समिति को यह बताते हैं कि उसमें क्या प्रक्रिया अपनाई गई किस-किस ने क्या लिखा, कैसे क्या निर्णय हुआ। यदि प्रधानमंत्री या उनके कार्यालय के पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है और प्रधानमंत्री को भी संदेह से परे रखना चाहिए, तो हम याद करा दें आरोपी अपनी जांच का मंच स्वयं नहीं चुनता प्रधानमंत्री ने यह कहकर अपना मंच स्वयं चुना कि वह पीएसी के समक्ष प्रस्तुत होने को तैयार हैं। लोलेस केवल कैग की रिपोर्ट पर अनुच्छेदवार टिप्पणियां दे सकती है जबकि 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन ही पूरी तरह से राजनीतिक मुद्दा है। क्या प्रधानमंत्री देश को यह बताना चाहेंगे कि एक दागी मंत्री को 3 वर्ष मंत्रालय में बने रहने की अनुमति कैसे मिल गई और आज तक उसके विरुद्ध कोई भी सीधी कार्रवाई नहीं हुई? सर्वो. न्याया. ने भी यह टिप्पणी की। । 
इच्छाशक्ति की बात करते है। यदि केंद्र सरकार अपनी चौतरफा आलोचना के बाद चेत गई है तो फिर देश को यह बताया जाए कि सर्वो. न्याया. की प्रतिकूल टिप्पणियों के बाद भी केंद्रीय सतर्पता आयुक्त के पद पर आसीन एक ऐसा व्यक्ति क्यों है जो न केवल पामोलीन आयात घोटाले में लिप्त होने का आरोपी है बल्कि अभियुक्त भी है? प्रश्न यह भी है कि मुसआ. (सीवीसी) के रूप में पीजे थॉमस की नियुक्ति सर्वो. न्याया. की ओर से निर्धारित प्रक्रिया के तहत क्यों नहीं की गई? एक दागदार छवि वाले व्यक्ति को मुसआ. बनाकर प्रधानमंत्री यह दावा कैसे कर सकते है कि वह भ्रष्टाचार के सख्त विरोधी है? यदि स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच कर रहे केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की निगरानी उच्चतम न्यायालय को करनी पड़ रही है तो क्या इसका एक अर्थ यह नहीं कि स्वयं शीर्ष अदालत भी यह मान रही है कि सीबीआई सरकार से प्रभावित हो सकती है? किसी राज्य में गलती का अनुसरण केंद्र कर रहा है तो गुज. व बिहार के विकास को आदर्श बनाया होता। । क्या सरकार ने स्वेच्छा से किसी भ्रष्ट तत्व के विरुद्ध कार्रवाई की, ऐसा कोई एक भी उदाहरण सरकार दे सकती है? 
बात इच्छाशक्ति की है। आज तक अफजल गुरु को फांसी क्यों नहीं दी गई? आतंकवाद को क्या यह सरकार रोकना चाहती है? लगता तो नहीं। वोट बैंक की चाह में देश की सुरक्षा से भी समझौता किया जा रहा है। इस सरकार का एक मात्र उद्देश्य किसी भी तरह से सत्ता में बने रहना है और जिससे उसके सत्ता कि नीव अस्थिर हो वह कोई ऐसा कदम नहीं उठाना चाहती तो गठबंधन के बहाने बन जाते हैं। 2जी स्पेक्ट्रम में भी यही प्राथमिकता है। सरकार अपने गठबंधन साथियों, विश्वस्त नौकरशाहों सहित सरकारी टुकड़ों पर पलते मीडिया के अपने उन पिट्ठुओं तथा मोटा चंदा देनेवाले उन उद्योगपतियों के पापों को ढकना चाहती है, जिनके साथ उसकी साठ गांठ हैं। । फिर भी प्रधानमंत्री कहते हैं कि मैं भ्रष्टाचार का सख्त विरोधी हूं। क्या सच मुच ?
डॉ. मनमोहन सिंह 
यह राष्ट्र जो कभी विश्वगुरु था,आजभी इसमें वह गुण,योग्यता व क्षमता विद्यमान है! आओ मिलकर इसे बनायें- तिलक

शनिवार, 18 दिसंबर 2010

काकोरी कांड (क्या भारत आजाद है ?)

काकोरी कांड (क्या भारत आजाद है ?)

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारियों द्वारा चलाए जा रहे इस संग्राम
को गति देने के लिए धन की तत्काल व्यवस्था की आवश्यकता के कारण शाहजहाँपुर में हुई बैठक
के मध्य राजेन्द्रनाथ ने अंग्रेजी सरकार का खजाना लूटने की योजना बनाई।
इस योजना को कार्यरूप देने के लिए राजेन्द्रनाथ ने 9 अगस्त 1925 को
लखनऊ के काकोरी से छूटी 8 डाउन ट्रेन पर क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ और
ठाकुर रोशन सिंह व 19 अन्य सहयोगियों के सहयोग से धावा बोल दिया।
बाद में अंग्रेजी शासन ने सभी 23 क्रांतिकारियों पर काकोरी कांड के नाम पर
सशस्त्र युद्ध छेड़ने तथा खजाना लूटने का मुकदमा चलाया जिसमें राजेन्द्रनाथ,
रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ तथा रोशन सिंह को फाँसी की सजा सुनाई गई।
!! 
आज है, 19 दिसंबर 1927 का वह दिन जब 'काकोरी कांड' के क्रांतिकारियों को फांसी दी गयी.
आइये उनका स्मरण करते हैं !! 

काकोरी जो लखनऊ जिले में एक छोटा सा गाँव हैं. स्वतंत्रता संग्राम को कुचलने भेजी
बंदूके और धन रोकने हेतु अंग्रेजो की ट्रेन को यहाँ लूटा गया इसलिए इसका
नाम काकोरी ट्रेन डकैती पड़ा. सबसे पहले राजेंद्र लाहिड़ी को 17 दिसंबर सन
1927 को गोंडा जिले (उत्तर प्रदेश) में फांसी दी गयी. ट्रेन को लूटने में
कुल 10 क्रन्तिकारी साथी थे. किन्तु जब गिरफ्तारियां हुई तो 40 से भी अधिक
लोग पकडे गए. कुछ तो निर्दोष थे. अशफाक उल्ला और बख्शी लाल तुरंत नहीं
पकडे जा सके. अंग्रेजी शासन ने इस मुकदमे में 10 लाख रुपये से भी अधिक व्यय किया.
बनवारी लाल ने गद्दारी की और इकबालिया गवाह बन गया. इसने सभी
क्रांतिकारियों को पकड़वाने में अंग्रेजो की सहायता की. इसे भी 5 वर्ष की
सजा हुई. 18 महीने तक मुक़दमा चला पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, राजेंद्र
लाहिड़ी और रौशन सिंह को फांसी की सजा हुई. राजेंद्र लाहिड़ी की 'अपील को
प्रीवी काउन्सिल' ने अस्वीकार कर दिया. शचींद्र नाथ सान्याल को कालेपानी की
सजा हुई. बाद में पकडे गए अभियुक्तों में अशफाक उल्ला को फैजाबाद जिले में 19 दिसंबर को
फांसी हुई और बख्शी लाल को कालेपानी की सजा हुई.
...अशफाक उल्ला बड़ी ख़ुशी के साथ कुरान - शरीफ का बस्ता कंधे से टांगे हुए हाजियों
( जो हज करने जाते हैं ) कि भांति 'लवेक' कहते और कलाम पढ़ते हुए फांसी के
तख्ते के पास गए. तख्ते को उन्होंने चूमा और सामने खड़ी भीड़ से कहा ( जो
उनकी फांसी को देखने आई हुई थी ) "मेरे हाथ इंसानी खून से कभी नहीं
रगें, मेरे ऊपर जो इलज़ाम लगाया गया वह गलत हैं. खुदा के यहाँ मेरा इन्साफ
होगा" ! इतना कह कर उन्होंने फांसी के फंदे को गले में डाला और खुदा का नाम
लेते हुए दुनिया से कूच कर गए.
उनके रिश्तेदार, चाहने वाले शव को शाहजहांपुर ले जाना चाहते थे.
बड़ी मिन्नत करने के बाद अनुमति मिली इनका
शव जब लखनऊ स्टेशन पर उतारा गया , तब कुछ लोगो को देखने का अवसर मिला.
चेहरे पर 10 घंटे के बाद भी बड़ी शांति और मधुरता थी बस आँखों के नीचे कुछ
पीलापन था. शेष चेहरा तो ऐसा सजीव था जैसे कि अभी अभी नींद आई
हैं, यह नींद अनंत थी. अशफाक कवि भी थे उन्होंने मरने से पहले शेर लिखा था
- "तंग आकर हम भी उनके जुल्म के बेदाद से !
चल दिए अदम ज़िन्दाने फैजाबाद से !!
ऐसे क्रांतिकारियों को मेरा कोटि कोटि प्रणाम !"
प्रश्न उठता है क्या भारत आजाद है? अंग्रेज़ी शासन व इस शासन में अंतर है ?
इसे देख दोनों प्रश्नों के उत्तर में कोई भी कहेगा - नहीं 

अंग्रेज़ी शासन में भी देश भक्तों व उनके समर्थकों तक को प्रताड़ित किया जाता था,
तथा शासन समर्थकों को राय साहब की पदवी व पुरुस्कार मिलते थे ?
आज भी शर्मनिरपेक्ष शासन में देश भक्तों को भगवा आतंक कह प्रताड़ित तथा
अफज़ल व आतंकियों को समर्थन, कश्मीर के अल कायदा के कुख्यात आतंकवादी
 
गुलाम मुहम्मद मीर को राष्ट्र की अति विशिष्ठ सेवाओं के लिए " पद्म श्री " सम्मान ?
यह राष्ट्र जो कभी विश्वगुरु था,आजभी इसमें वह गुण,योग्यता व क्षमता विद्यमान है! आओ मिलकर इसे बनायें- तिलक

गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

खुदीराम बोस भारत को कुचल रहे ब्रिटिश पर जो पहला बम था, इस राष्ट्र नायक ने फैंका था,स्कूल में भी वह वन्दे मातरम जैसे पवित्र शब्दों की ओर आकर्षित था ! '(मैं भारत माता के चरणों में शीश नवाता हूँ !) और आजादी के युद्ध में कूद पड़े. 16 वर्ष का लड़का पुलिस अवज्ञा कर 19 वर्ष की आयु में जब वह बलिदान हुआ उसके हाथों में एक पवित्र पुस्तक भागवद गीता (देवी गीत) के साथ उसके होठों पर था वंदे मातरम का नारा.--लेखक ! यह अवसर था, फरवरी 1906 में एक भव्य प्रदर्शनी की बंगाल में मेदिनीपुर में व्यवस्था की गयी थी. उद्देश्य तो भारत के ब्रिटिश शासक के भारत में अन्याय को छिपाने का था. प्रदर्शनी पर कठपुतलिया और चित्र थे, जो धारणा बना सकते है कि विदेशी ब्रिटिश शासक भारत के लोगों की सहायता कर रहे थे! प्रदर्शनी देखने के लिए वहाँ बड़ी भीड़ थी ! तब, विज्ञप्ति शीर्षक 'सोनार बांग्ला' के साथ वंदे 'मातरम् नारा लिए पत्रक के एक बंडल के साथ 16 वर्ष का एक लड़का दिखाई दिया, वह पत्रक उन लोगों को वितरण किया गया. इसके अतिरिक्त यह प्रदर्शनी लगाने में अंग्रेजों का असली उद्देश्य यह भी पत्रक में बताया गया. तथा ब्रिटिश अन्याय और अत्याचार के विभिन्न रूपों का खुलासा भी !प्रदर्शनी के लिए आगंतुकों के अतिरिक्त, वहाँ कुछ एक इंग्लैंड के राजा के प्रति वफादार भी थे. उन लोगों ने अंग्रेजों के अन्याय उजागर करने का विरोध किया ! वंदे मातरम् जैसे शब्द '(स्वतंत्रता) और' स्वराज्य '(आत्म शासन) उन्हें पिन और सुई की तरह चुभते थे. वे पत्रक वितरण से लड़के को रोकने का प्रयास किया. उनकी आँखें गुस्से से लाल, वे लड़के पर गुर्राए glared, उसे डांटा और उसे धमकाते किया बवाल. लेकिन उन्हें अनदेखा कर लड़का शांति से पत्रक वितरण करता चला गया. जब कुछ लोगों ने उस पर कब्जा करने का प्रयास किया, वह चालाकी से भाग निकले. अंतत: एक पुलिसकर्मी के हाथ की पकड़ लड़के पर पद गई वह पत्रक का बंडल भी खींच लिया. लेकिन पकड़ने के लिए लड़का इतना आसान नहीं था. वह अपने हाथ झटकाता मुक्त हुआ. फिर वह हाथ लहराया और पुलिस वाले की नाक पर शक्तिशाली वार किया. फिर वह पत्रक भी अधिकार में ले लिया, और कहा, "ध्यान रखो, कि मेरे शरीर को स्पर्श नहीं! मैं देखता हूँ  आप मुझे कैसे एक वारंट के बिना गिरफ्तार कर सकते हैं!."वो झटका प्राप्त पुलिस वाला फिर आगे बढ़ा, लेकिन लड़का वहाँ नहीं था. वह भीड़ के बीच गायब हो गया था.चाय पान के समय, लोगों के रूप में वंदे 'मातरम् तूफान से पुलिस और राजा के प्रति वफादार भी अपमानित और आश्चर्य से भरे दुखी थे.बाद में एक मामला लड़के के विरुद्ध दर्ज किया गया था, लेकिन अदालत ने उसे लड़के कि कम आयु के आधार पर निर्धारित किया है.जो वीर लड़का इतना बहादुरी से मेदिनीपुर प्रदर्शनी में पत्रक वितरित कर गया और जिससे अंग्रेजों की कुत्सित चालों को हराया खुदीराम बोस था.खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसम्बर 1889 को मेदिनीपुर जिले के गांव बहुवैनी में हुआ था. उनके पिता त्रैलोक्य नाथ बसु नादाज़ोल राजकुमार के शहर के तहसीलदार थे. उसकी माँ लक्ष्मी प्रिया देवी जो अपने धार्मिक जीवन और उदारता के लिए एक पवित्र औरत अधिक जानी जाती थी. हालांकि घर में कुछ बच्चों पैदा हुए थे सब की जन्म के बाद शीघ्र ही मृत्यु हो गई. केवल एक बेटी बच गई. अंतिम बच्चा, खुदीराम बोस, एकमात्र जीवित बेटा था.
बोस परिवार को एक नर बच्चे की चाह थी. लेकिन लंबे समय के लिए उनके आनंद की आयु पर्याप्त नहीं रह सकी. वे अप्रत्याशित रूप से मर गया जब खुदीराम मात्र 6 वर्ष था. उसकी बड़ी बहन अनुरुपा देवी और जीजाजी अमृतलाल ने उसे पालने की जिम्मेदारी कंधे पर ली थी. अनुरुपा देवी ने एक माँ के स्नेह के साथ खुदीराम का पालन कियावह चाहती थी, उसका छोटा भाई अत्यधिक शिक्षित, एक उच्च पद पाने के बाद नाम हो! वह इसलिए उसे पास के एक स्कूल में भर्ती कराया.  ऐसा नहीं था कि खुदीराम नहीं सीख सकता थावह कुशाग्र था और चीजों को आसानी से समझ सकता थालेकिन उसका ध्यान अपनी कक्षा में पाठ के लिए नहीं लगाया जा सका. हालांकि उनके शिक्षकों ने अपनी आवाज के शीर्ष पर चिल्लाया, वह सबक नहीं सुना. सबक से पूरी तरह से असंबंधित विचार उसके सिर में घूमते रहे थे जन्म से एक देशभक्त, खुदीराम बोस ने 7-8 वर्ष की आयु में भी सोचा, ' भारत हमारा देश है. यह एक महान देश है. हमारे बुजुर्गों का कहना है कि यह सहस्त्रों वर्षों से ज्ञान का केंद्र है. तो क्रोधित ब्रिटिश यहाँ क्यों हो ? उनके अधीन, हमारे लोग भी जिस रूप में वे चाहते नहीं रह सकते. बड़ा होकर, मैं किसी तरह उन्हें देश से बाहर खदेड़ दूंगा 'पूरे दिन लड़का इन विचारों में लगा था. इस प्रकार जब वह पढ़ने के लिए एक किताब खोले, उसे एक क्रोधित ब्रिटिश की हरी आंखों का सामना करना पड़ा. यहां तक कि जब वह खा रहा था, वही याद उसका पीछा करती रही और स्मृति उसके दिल में एक अजीब सा दर्द लाई. उसकी बहन और उसके जीजा दोनों ने सोचा लड़का परेशान क्यों है ? उन्होंने सोचा कि उसकी माँ की स्मृति उसे परेशान किया है, और उसे अधिक से अधिक स्नेह दिया. किन्तु खुदीराम भारत माता के बारे में दुखी था. उसकी पीड़ा में दिन पर दिन वृद्धि हुई. 
गुलामी से बदतर रोग न कोय ?एक बार खुदीराम एक मंदिर में गया था. कुछ व्यक्ति मंदिर के सामने बिना आसन जमीन पर लेट रहे थे. "क्यों लोग बिना आसन जमीन पर लेट रहे हैं", खुदीराम ने कुछ व्यक्तियों से पूछा, उनमें से एक ने विस्तार से बताया: "वे किसी न किसी बीमारी से पीड़ित हैं व एक मन्नत मानी है और भोजन और पानी के बिना यहाँ पड़ रहेंगे जब तक भगवान उनके सपने में दिखकर रोग ठीक करने का वादा नहीं देता ..."खुदीराम एक पल के लिए सोचा और कहा, "एक दिन मुझे भी तप करने के लिए भूख और प्यास भुला कर और इन लोगों की तरह जमीन पर बिना आसन लेटना होगा.""आपको क्या रोग है?" एक आदमी ने लड़के से पूछा! खुदीराम हँसे, और कहा, "गुलामी से बदतर रोग न कोय ? हमें इसे बाहर खदेढ़ना होगा ."कितनी  कम उम्र में भी, खुदीराम ने इतनी गहराई से देश की स्वतंत्रता के बारे में सोचा था. लेकिन वह इसे कैसे प्राप्त करे ? यह समस्या हमेशा उस के मन को घेरे रखती थी . वह सफलतापूर्वक कैसे अपने कर्तव्य पूरा कर सकता है? इस प्रकार चिंतित खुदीराम से एक दिन का नाद सुना 'वंदे मातरम', 'भारत माता की जय' (विजय मदर इंडिया के लिए). वह इन शब्दों से रोमांचित था, उसकी आँखें चमकने लगी और वह आनंद का अनुभव किया.
पत्रकारिता व्यवसाय नहीं एक मिशन है-युगदर्पणयह राष्ट्र जो कभी विश्वगुरु था,आजभी इसमें वह गुण,योग्यता व क्षमता विद्यमान है! आओ मिलकर इसे बनायें- तिलक